दोस्तों, आज से मैंने भी ब्लॉग की दुनिया में कदम रखा। मेरे पिताजी डॉ शिवरतन लाल 'बर्क पुन्छ्वी ' एक शायर है। प्रस्तुत है उनके कुछ शेर -
इजाजत तो ले लो ज़माने से पहले।
जरा सोच ले तू भी जल न जाए ,
नगर में मेरा घर जलाने से पहले।
हवाओ की हमदर्दियाँ कर ले हासिल,
दीया आंधियो में जलाने से पहले।
कुछ आंसू भी आँखों में अपनी बचा रख
मोहब्बत में तू मुस्कुराने से पहले।
जरा बिजलियो से भी समझौता कर लें,
चमन में नशेमन बनाने से पहले।
बर्क पुन्छ्वी
(क्षमा चाहूँगा मात्रा की कुछ गलतियो के लिए , ये टेक्निकल समस्या है)

4 टिप्पणियां:
बधाई निर्मल, ब्लाग की दुनिया में स्वागत है.अपनी बात भी कुछ हो जाए.आपके पिताजी की शायरी बहुत जोरदार है.जीवन की सच्चाईयों से मुठभेड़ करती शायरी जमाने की पोल खोल कर रख देती है.उनकी कुछ और रचनाएं पढवाएं.
स्वागत हो, अपने पिताजी की गजलो से आपने अच्छी शुरुआत की है। बधाई ... गीताश्री जी से मैं भी सहमत हूँ । पोस्ट में अपने विचार भी शामिल करें और समय समय पर पिताजी की रचनायें पढ़वाते रहें।
पंकज नारायण
gungunaae laayak gazal hai, aapki tasveer badi modern hai bilkul bhi shairaanaa nahi, jabki aapki tabiyat aur mijaaz shaairaanaa saa lagtaa hai...soch kar dekhen...
Dr. Sarita
bhaia,
aapane to kamal kar diya. Pita ke liye isase achchha aur kya tohafa ho sakata tha. Isvar aapako lambi umar de. Aur mujhe bhi kyoki aapako mai bhi dekhata rahunga.
Thanks.
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